कुरुक्षेत्र एसवाईएल नहर में गिरी कार में युवक व नाबालिग छात्रा की लाशों ने खड़े किए कई असहज सवाल
Kurukshetra SYL canal tragedy
✍️ संदीप कम्बोज | खबरदार भारत
कुरुक्षेत्र की एसवाईएल नहर में गिरी कार अब सिर्फ एक खबर नहीं रही। यह घटना आज के समाज, आज के युवाओं और सबसे ज्यादा आज के माता-पिता की चुप्पी पर एक करारा तमाचा बन चुकी है। एसवाईएल नहर में गिरी एक कार ने सिर्फ दो जिदगियों को ही नहीं छीना, बल्कि पूरे समाज के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। 17 वर्षीय छात्रा और 22 वर्षीय युवक के शव और पीछे रह गया सन्नाटा सवालों से भरा, जवाबों से खाली।यह सिर्फ एक सड़क हादसा नहीं है। यह उस सामाजिक लापरवाही की तस्वीर है, जिसे हम रोज नजरअंदाज करते हैं और जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तब कुछ देर अफसोस जताकर फिर भूल जाते हैं।
सवाल जो चुभते हैं, लेकिन जरूरी हैं
आज सोशल मीडिया से लेकर गली-चौराहों तक एक ही सवाल बार-बार उठ रहा है आखिर ये दोनों नहर के किनारे क्या कर रहे थे? यह सवाल असंवेदनशील नहीं, बल्कि स्वाभाविक है। कोई भी समझदार व्यक्ति यह सोचने को मजबूर होगा कि क्या 17 साल की छात्रा और 22 साल का युवक किसी शैक्षणिक कार्य के लिए नहर किनारे गए थे? क्या यह जगह पढ़ाई, परीक्षा की तैयारी या करियर निर्माण के लिए जानी जाती है?अगर नहीं, तो उनके वहाँ होने की जिम्मेदारी किसकी थी? इन सवालों का जवाब जांच देगी, लेकिन सवाल पूछना समाज का अधिकार है।
माता-पिता और अभिभावकों की भूमिका पर कठोर प्रश्न
सबसे बड़ा सवाल अभिभावकों से है। आज के दौर में माता-पिता यह मानकर निश्चिंत हो जाते हैं कि बच्चा कॉलेज जाता है, पढ़ाई करता है, सब ठीक है। लेकिन क्या वाकई सब ठीक है? क्या माता-पिता जानते हैं कि उनके बच्चे किसके साथ समय बिता रहे हैं? वे कहां जा रहे हैं, किस वाहन में, किस उद्देश्य से? क्या पढ़ाई के नाम पर बाहर जाना अब एक ढाल बन चुका है? यह कहना कड़वा है, लेकिन सच है अभिभावकों की लापरवाही भी ऐसे हादसों की जमीन तैयार करती है। अब इसी हादसे से लिजिए जिस छात्रा का यहां शव मिला है, वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की स्टूडेंड है। अब सवाल उठता है अभिभावकों की निगरानी कहाँ थी। उनकी बेटी क्या वास्तव में पढ़ाई कर रही है, वह कहाँ और किसके साथ जा रही है, क्या यह जानना उनका दायित्व नहीं बनता था
नैतिकता: क्या हम सबने आंखें बंद कर ली हैं?
समाज अब एक अजीब बीमारी से ग्रस्त है मेरा बच्चा, मेरी मर्जी वाली सोच। लेकिन सवाल यह है क्या नाबालिग की मर्जी सर्वोपरि हो सकती है? क्या आजादी के नाम पर नैतिक सीमाएं खत्म कर दी गई हैं क्या अनुशासन अब पुराने जमाने की चीज हो गया है? एक 17 साल की छात्रा और 22 साल का युवक नहर किनारे किस उद्देश्य से गए थे यह सवाल पुलिस की जांच तय करेगी, लेकिन समाज यह पूछने का पूरा हक रखता है कि वे वहां पढ़ाई करने तो नहीं गए थे। वे वहां करियर बनाने तो नहीं गए थे। फिर सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है आखिर वहां क्या किया जा रहा था?
हादसा कहकर सच से भागना आसान है
हर बड़ी त्रासदी के बाद समाज की सबसे सुरक्षित ढाल होती है। जांच चल रही है, कुछ कहना ठीक नहीं,संवेदनशील मामला है। लेकिन सवाल यह है क्या सवाल पूछना असंवेदनशील हो गया है? जब एक नाबालिग छात्रा और एक युवा लड़का एकांत में, नहर किनारे, एक कार में पाए जाते हैं तो सवाल उठना अपराध नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक जिÞम्मेदारी है।
कानूनी नजरिए से भी मामला साधारण नहीं
कानून साफ है 17 वर्षीय लड़की कानूनी रूप से नाबालिग है। नाबालिग की सुरक्षा, गतिविधि और आवाजाही की पूरी जिम्मेदारी अभिभावकों की होती है। अगर नाबालिग जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में पाई जाती है, तो यह सिर्फ दुर्घटना नहीं रह जाती। यह बात कड़वी है, लेकिन सच है कानून माता-पिता से सवाल पूछता है। बेटी कहां गई थी? किसके साथ गई थी? किस अनुमति से? किस निगरानी में? इन सवालों से बचा नहीं जा सकता।
सोशल मीडिया ने युवाओं को नहीं, माता-पिता को अंधा किया है
आज माता-पिता गर्व से कहते हैं हम अपने बच्चों पर भरोसा करते हैं। लेकिन भरोसे और लापरवाही में फर्क होता है। मोबाइल में लॉक, बाहर जाने पर सवाल नहीं, देर रात लौटने पर चुप्पी, पढ़ाई कर रहा है कहकर संतोष। यही चुप्पी एक दिन नहर की गहराई बन जाती है। क्या ऐसे मामलों में सिर्फ सहानुभूति काफी है? यह सवाल भी जरूरी है, चाहे कितना भी असहज लगे अगर यह साबित हो कि नैतिक सीमाओं को जानबूझकर लांघा गया, जोखिम को नजरअंदाज किया गया, अभिभावकीय नियंत्रण पूरी तरह गायब था तो क्या समाज को सिर्फ मोमबत्ती जलाकर चुप हो जाना चाहिए? सहानुभूति जरूरी है, लेकिन अंधी सहानुभूति अगली त्रासदी को जन्म देती है।
सहानुभूति और जिम्मेदारी दोनों जरूरी
यह साफ कहा जाना चाहिए किसी की मौत पर तंज नहीं। किसी के दुख पर राजनीति नहीं लेकिन सहानुभूति का मतलब यह नहीं कि हम आंखें मूंद लें। अगर समाज सवाल नहीं पूछेगा, तो अगली कार किसी और नहर में गिरेगी। अगर चेतावनी नहीं दी जाएगी, तो अगला शव किसी और घर का होगा।
यह लेख आरोप नहीं, चेतावनी है
यह लेख किसी एक परिवार, एक लड़की या एक युवक को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं है।
यह लेख हर उस मां-बाप के लिए चेतावनी है जो यह सोचते हैं कि मेरा बच्चा ऐसा नहीं कर सकता। समय रहते पूछिए, कहां जा रहे हो? किसके साथ हो? कब लौटोगे? क्यों जा रहे हो? यह सवाल सख़्ती नहीं, जिÞम्मेदारी हैं।
प्रशासन और सिस्टम भी कटघरे में
यह भी सवाल है नहर किनारे सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं? चेतावनी बोर्ड, बैरिकेड, निगरानी क्यों नहीं? ऐसे स्थान युवाओं के लिए खुला अड्डा कैसे बन जाते हैं? अगर प्रशासन सिर्फ हादसे के बाद जागता है, तो वह भी उतना ही दोषी है। यह लेख किसी के चरित्र पर हमला नहीं, समाज पर वार है। यह साफ कहा जाना चाहिए यह लेख किसी मृत छात्रा या युवक को दोषी ठहराने के लिए नहीं है। लेकिन यह लेख माता-पिता की लापरवाही, समाज की चुप्पी, नैतिक मूल्यों के पतन, कानूनी जिÞम्मेदारियों से भागने की आदत पर सीधा हमला है।
हर मां-बाप के लिए आखिरी चेतावनी
एसवाईएल नहर में गिरी कार एक घटना है, लेकिन उसमें डूबती निगरानी, टूटता संवाद और ढहती जिÞम्मेदारी एक चेतावनी है। अगर आज भी आप सोचते हैं हमारे साथ ऐसा नहीं होगा। तो याद रखिए हर खबर का पहला वाक्य यही सोच लेकर शुरू हुआ था। अपने बच्चों से प्यार कीजिए, लेकिन सवाल पूछना मत छोड़िए। क्योंकि कल कोई और कार गिरेगी, कोई और लाश निकलेगी, और कोई और मां-बाप रोएंगे। तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी। अगर आज भी हम इसे सिर्फ दुर्घटना कहकर भूल गए, तो कल कोई और माँ-बाप कैमरे के सामने रोते दिखेंगे। अब भी समय है बच्चों से दोस्ती करें,लेकिन आंखें बंद न करें।
संदीप कम्बोज
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
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