- 700 रुपये की किताब, पहली कक्षा का सेट 4000 का,निजी प्रकाशकों, स्कूल प्रबंधन और सत्ता के संरक्षण में निजी स्कूल बने व्यापारिक मॉल
- देशभर के अभिभावकों की जेब काटने का सिलसिला कब रुकेगा, अब आखिरी उम्मीद सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से !
संदीप कम्बोज। खबरदार भारत
देश में शिक्षा को हमेशा ज्ञान का मंदिर कहा गया है। लेकिन आज यही मंदिर कई जगहों पर व्यापारिक मॉल में बदलते नजर आ रहे हैं। हर साल नए सत्र की शुरूआत होते ही देश के लाखों अभिभावकों के सामने सबसे बड़ा संकट होता है झ्र स्कूल फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों का भारी बोझ। ताजा मामला एक समाचार में सामने आया है जिसमें बताया गया कि कक्षा आठ की साइंस की किताब 700 रुपये में बेची जा रही है, जबकि एनसीईआरटी की किताबें इससे 80-85 प्रतिशत तक सस्ती हैं। यह सवाल सिर्फ एक शहर या एक स्कूल का नहीं है। आज दिल्ली, मुंबई, जयपुर, लखनऊ, पटना, चंडीगढ़, भोपाल, नागपुर, अहमदाबाद से लेकर हर राज्य के छोटे शहरों, कस्बों, गांवों तक हर जगह अभिभावक इसी दर्द से गुजर रहे हैं। अब समय आ गया है एजुकेशन माफिया पर सर्जिकल स्ट्राईक का जो राजनीतिक संरक्षण से सरेआम अभिभावकों को डंके की चोट पर लूट रहे हैं। देश की सर्वोच्च अदालत माननीय सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि अब देश में पनप चुके शिक्षा माफिया पर एक करारी चोट कर इन्हें सबक सिखाया जाए ताकि अभिभावक इनके हाथों लुटने से बचें।
एक नजर में लूट का खेल
पहली कक्षा की किताबों का सेट : 4000 से 4500
आठवीं की एक किताब : 700 तक
एनसीईआरटी की वही किताब : 60-100
यानी निजी किताबें 85% तक महंगी
भूमिका : शिक्षा के मंदिर या व्यापारिक दुकानें?
संरक्षण : नेताओं, मंत्रियों, विधायकों की
बड़ा सवाल : आखिर किसके संरक्षण में चल रही यह लूट?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह लूट इतनी खुलेआम हो रही है तो सरकारें चुप क्यों हैं? कई शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि देश के 60% से अधिक निजी स्कूल सीधे या परोक्ष रूप से राजनेताओं, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों या उनके रिश्तेदारों से जुड़े हुए हैं। जब स्कूलों का मालिकाना हक ही सत्ता से जुड़ा हो तो कार्रवाई की उम्मीद किससे की जाए? यही कारण है कि न तो राज्य सरकारें कड़े नियम बना रही हैं और न ही केंद्र सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठा रही है।
किताबों का खेल : कैसे चल रही है खुली लूट ?
निजी स्कूलों में सबसे बड़ा खेल किताबों और कॉपियों का होता है। स्कूल प्रबंधन अक्सर किसी खास निजी प्रकाशक से समझौता कर लेते हैं उसी प्रकाशक की किताबें स्कूल में अनिवार्य कर दी जाती हैं। किताबें बाहर कहीं और नहीं मिलतीं। परिणामस्वरुप अभिभावकों को मजबूरी में स्कूल द्वारा तय की गई महंगी किताबें ही खरीदनी पड़ती हैं। कई बार तो यह भी देखने में आता है कि किताबें सिर्फ स्कूल कैंपस या तय दुकान पर ही मिलती हैं। बाहर से खरीदने की अनुमति नहीं होती। यह व्यवस्था एक तरह का संगठित व्यापार बन चुकी है।
यूनिफॉर्म और बैग का भी सिंडिकेट
किताबों के अलावा इन स्कूलों में यूनिफॉर्म, जूते, बैग, टाई, बेल्ट तक के लिए भी फिक्स दुकानें तय कर दी जाती हैं। इन दुकानों पर सामान अक्सर बाजार से 2-3 गुना महंगा मिलता है। अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं होता क्योंकि स्कूल कहता है कि यही यूनिफॉर्म और यही सामान अनिवार्य है।
अभिभावकों की जेब पर कितना बोझ?
एक सामान्य प्राइवेट स्कूल में एडमिशन फीस : 25,000 से 50,000 रुपए तक
मासिक फीस : 3000 से 10,000
किताबें : 4000 से 8000
यूनिफॉर्म : 2000 से 5000
यानि एक बच्चे की शुरूआती लागत ही 25,000 से 70,000 तक पहुंच जाती है।
शिक्षा माफिया की खुली लूट पर सरकारें क्यों खामोश?
यह सवाल आज हर अभिभावक पूछ रहा है। अगर देश में पेट्रोल की कीमत नियंत्रित हो सकती है
दवाओं की कीमत तय हो सकती है तो फिर स्कूल फीस और किताबों की कीमतें क्यों नहीं? कई राज्यों ने फीस नियंत्रण कानून बनाए जरूर हैं, लेकिन उनका पालन नहीं होता या फिर स्कूल अदालतों में चुनौती देकर उन्हें कमजोर कर देते हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट ही आखिरी उम्मीद?
जब सरकारें कार्रवाई नहीं करतीं तो देश की जनता की नजरें न्यायपालिका की ओर उठती हैं। देश के कई शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि अब सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए। क्योंकि यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि शिक्षा का अधिकार, समान अवसर और सामाजिक न्याय से जुड़ा सवाल है।
सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?
अगर सर्वोच्च न्यायालय चाहे तो वह कुछ स्पष्ट दिशानिर्देश जारी कर सकता है:
1 पूरे देश में समान सिलेबस
सभी स्कूलों में एनसीईआरटी आधारित सिलेबस लागू हो।
2 किताबों की कीमत तय
निजी किताबों पर अधिकतम मूल्य सीमा तय हो।
3 स्कूलों को बिक्री पर रोक
स्कूल सीधे किताबें, यूनिफॉर्म या बैग बेचने के लिए बाध्य न कर सकें।
4 फीस रेगुलेशन बोर्ड
हर राज्य में स्वतंत्र फीस नियामक बोर्ड बने।
5 पारदर्शिता
स्कूलों को अपनी आय-व्यय सार्वजनिक करनी पड़े।
क्या हो सकते हैं संभावित निर्देश
किताबें केवल एनसीईआरटी या मानक प्रकाशकों की
यूनिफॉर्म कहीं से भी खरीदने की अनुमति
फीस वृद्धि की अधिकतम सीमा तय
हर स्कूल को आॅडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करनी होगी
अभिभावक क्या करें?
आज लाखों अभिभावक इस स्थिति से परेशान हैं। लेकिन सवाल है कि वे जाएं तो जाएं कहां? कुछ कदम जो अभिभावक उठा सकते हैं:
अभिभावक संघ बनाएं
जिला शिक्षा अधिकारी को शिकायत दें
उपभोक्ता अदालत में मामला दर्ज करें
सोशल मीडिया पर मुद्दा उठाएं
जनहित याचिका दाखिल करें
जागो अभिभावकों!
सबसे जरूरी बात यह है कि अगर समाज चुप रहेगा तो यह लूट और बढ़ेगी। आज जरूरत है कि अभिभावक समझें कि अगर आज आवाज नहीं उठाई तो आने वाले वर्षों में शिक्षा पूरी तरह व्यापार बन जाएगी।
क्या अब लगेगी शिक्षा माफिया पर लगाम?
भारत जैसे देश में जहां करोड़ों परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का सपना देखते हैं, वहां शिक्षा का इस तरह महंगा और व्यावसायिक होना बेहद चिंताजनक है। यह सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक असमानता का भी बड़ा कारण बन सकता है। अब सवाल यही है क्या देश की सरकारें इस पर कदम उठाएंगी या फिर सुप्रीम कोर्ट को ही आगे आकर इस शिक्षा माफिया पर लगाम लगानी होगी? देश के लाखों अभिभावक आज यही उम्मीद लगाए बैठे हैं।
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